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भारत का रहने वाला हूं, अभी बिहार की बात बता रहा हूं... पत्रकार @live_Hindustan| छात्र @iimc_india

New Delhi, India
Joined June 2019
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता @ShahnawazBJP जी के साथ बिहार विधानसभा 2025 पर मेरी बातचीत ।
Bihar Election कैसे जीतेगी BJP, कौन होगा CM? शाहनवाज हुसैन ने क्या बताया? #BiharElections #ShahnawazHussain Watch on YT- youtube.com/watch?v=XM3inv03…
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"It is a great honor for me to share my journalism story with the students of the very IIMC I always dreamed of joining."❤️
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प्रशांत किशोर ने विधायक के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ले ली है। बधाई दे दिया जाए.... #prashantkishor
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आज यानी 16 अगस्त को भारत रत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि है। संयोग देखिए कि कल रात को 2 बजे ही मैंने उन पर लिखी @vijaitrivedi जी की यह किताब पढ़कर समाप्त की है। हम सबके प्रिय अटल जी की पुण्यतिथि पर उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि। 🙏 #AtalBihariVajpayee #tribute
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Hello @ACKOIndia, my car met with an accident on 22 July. I raised the claim the same day, and your team picked it up on 23 July. Delivery was promised for 30 July, it didn't happen. Now I'm being told to collect the car either from the garage or from my office on 1 August. 1/3
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Please take immediate cognizance of this matter @ACKOIndia
Hello @ACKOIndia, my car met with an accident on 22 July. I raised the claim the same day, and your team picked it up on 23 July. Delivery was promised for 30 July, it didn't happen. Now I'm being told to collect the car either from the garage or from my office on 1 August. 1/3
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Please look into this matter @BPCLimited
This quoted post is unavailable.
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फिर से ग्राउंड जीरो पर❤️ #bihar #bankipur #pk
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भावुक है पूरा बिहार, कैसे चलेगा बिना नीतीश कुमार? @NitishKumar #NitishKumarResign
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बिहार की दिलचस्प राजनीतिक घटनाक्रम पर एक और शानदार किताब हाथ लगी…लेखक हैं हम सब के प्रिय द इंडियन एक्सप्रेस के सीनियर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह सर। @santoshchitra Book– जेपी से बीजेपी: सौ साल के आईने में बिहार किन्हें पढ़नी चाहिए? अगर बिहार की राजनीति में इंटरेस्ट है, समाजवादी पार्टियों के उद्भव और अवसान में दिलचस्पी है, लोहिया और जेपी के विचारधारा को जानने का मन है, लालू, रामविलास और नीतीश की तिकड़ी के जिंदगी की असली कहानियों में डूबने का मन है, कैसे समाजवादियों ने जीत के अश्वमेध रथ पर सवार कांग्रेस को बेदखल कर सत्ता की चाबी हासिल की के साथ कर्पूरी ठाकुर, लोहिया और जेपी के वैचारिक समाजवाद से जातिगत राजनीति के आकंठ में डूब कर राजनीति करने वाली मौजूदा पार्टियों की विकास यात्रा को जानने का मन है तो यह किताब बिल्कुल आपके काम की है। साथ ही इस किताब में आपको तथाकथित लालू के जंगलराज से लेकर नीतीश के सुशासन की विकास यात्रा से करीब से गुजरने का मौका मिलेगा। किताब का हासिल क्या? अगर व्यक्तिगत अनुभव की बात करें तो कहानियों का फ्लो और किरदारों का क्रम इतना शानदार है कि 2 दिन में ही पूरी किताब खत्म कर डाली। दरअसल, यह ‘JP to BJP: Bihar After Lalu and Nitish’ का हिंदी अनुवाद है। इस किताब को पढ़ने से बिहार की राजनीति और यहां से निकले करीब–करीब सभी चर्चित नेताओं के बारे में एक सामान्य समझ बन जाएगी। साथ ही वर्तमान समय के वैसे युवा नेताओं के बारे में जानकारी मिलेगी जो भविष्य में बिहार के राजनीति को आगे ले जाने वाले हैं। कई जगह वर्ष और साल में टाइपो है जिसे ठीक किया जा सकता है। एक और शानदार किताब को हम सबों के बीच लाने के लिए बहुत आभार रहेगा सर…🙏
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कल रात ही जेएनयू में इतिहास के प्रोफेसर रहे आदित्य मुखर्जी की ‘नेहरू का भारत- अतीत, वर्तमान और भविष्य’ किताब पढ़कर खत्म किया। किताब पढ़ते-पढ़ते एक सीनियर की याद आ रही थी जिन्होंने कहा था कि इस दुनिया में दो तरह के लेखक होते हैं। एक तथ्यों के आधार पर लिखते हैं तो दूसरे संभावित पुरस्कार के लिए चाटुकारिता के चरमोत्कर्ष पर पहुंचकर। अब आदित्य मुखर्जी किस कैटेगरी में आते हैं यह आपके ऊपर है। क्या शानदार तरीके से दूसरे देश के सांसद और दार्शनिक या प्रोफेसर की बात को अपनी छोटी सी किताब में जगह देते हैं। इसी तरह का एक उदाहरण है जिसमें एक विदेशी लेखक का उद्धरण शामिल है जिसमें वह कह रहे हैं कि भारत के अल्पसंख्यक बिना कानूनी कार्यवाही के मार दिए जा रहे हैं और उनके घरों पर बुलडोजर चलाए जा रहे हैं… वहीं, दूसरे एक विदेशी व्यक्ति का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस को आगाह किया है कि हम भारत में वह शुरू होते देख रहे हैं जो इतिहास में दुनिया का सबसे बड़ा नरसंहार होगा। अब कोई बताए कि भारत में धर्म के आधार पर सबसे बड़ा नरसंहार और विस्थापन कब हुआ? उस समय सरकार के मुखिया और प्रधानमंत्री कौन थे? खुद जवाहरलाल नेहरू। इसी तरह 100 पन्नों की इस किताब में कम से कम 25 बार आरएसएस को सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी संगठन कहना भी पूर्वाग्रह से ग्रसित लगता है। जबकि कई विरोधाभासों के बावजूद खुद नेहरू ने संघ के कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री रहते हुए 26 जनवरी की परेड में 1962 में चीन के विरुद्ध हुए युद्ध में शानदार योगदान के लिए आमंत्रित किया था। बड़े ही सलीके से उन्होंने कांग्रेस को लिबरल जबकि मौजूदा भाजपा की सरकार को कट्टर बताया है। जबकि इतिहास गवाह है कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के अलावा 1984 का सिख दंगा और 1989 का भागलपुर दंगा किसकी सरकार में हुआ है। मुखर्जी साहब इस बात का जिक्र भी कर देते कि कोई कांग्रेस का प्रधानमंत्री था जिसने सिख दंगे के बाद कहा था कि बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। इसके अलावा, बड़े सलीके से विद्या भारती की सरस्वती शिशु मंदिर को विभाजनकारी नफरती विचारधारा को फैलाने का माध्यम बताया। मौजूदा समय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते-करते 1951 में प्रधानमंत्री रहते नेहरू के प्रेस पर अंकुश लगाने और आजाद भारत के इतिहास में मीडिया और पत्रकारों को कुचलने के लिए कुख्यात 1975 की इमरजेंसी का जिक्र तक नहीं किया। दूसरी ओर लिबरल बनने के चक्कर में बड़े ही सलीके से 1026 में मुस्लिम आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर को तोड़ने और हजारों पुजारी की हत्या करने को ‘मध्यकाल में सभी धर्म और संप्रदायों को लूटने या अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए एक नियमित चलन’ कहकर डिफेंड कर दिया। कुल मिलाकर सार यह है कि ऐसे प्रोफेसर तथाकथित लिबरल इतिहासकार कहलवाने के चक्कर में लॉन्ग टर्म में देश के साथ-साथ अपनी आईडियोलॉजिकल कमिटमेंट वाली पार्टी का संगठन का जबरदस्त नुकसान कर देते हैं। पढ़ने वालों का तो नुकसान होता ही है… जय हिंद🇮🇳
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जरुरी लगे तो #Mint में मेरी लिखी ये आर्टिकल पढ़ सकते हैं... 2014 से 2025 तक इनकम टैक्स में क्या-क्या बदला? मोदी सरकार के बड़े फैसलों की पूरी कहानी livemint.com/hindi/business/…
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करीब 10 दिन पहले यह किताब मेरे हाथ लगी। दरअसल, मैं काफी लंबे समय से बिहार सेंट्रिक एक ऐसी किताब ढूंढ रहा था जिसमें बिहार जैसे राज्यों में जहां पूरे देश को लगता है कि यहां जाति सबसे बड़ा फैक्टर है, कास्ट असर्शन (अपनी जाति की पहचान का दावा करना) और सामाजिक सत्ता में आए बदलावों पर विस्तार से चर्चा की गई हो। मेरे हिसाब से बिहार में हुए सामाजिक बदलाव को समझने के लिए यह एक ठीक किताब है। बिहार में हुए सामाजिक परिवर्तन के बारे में सामान्य समझ बन जाती है। यह किताब मूल रूप से 20वीं सदी की शुरुआत से लेकर 1990 तक के घटनाक्रम को कवर करती है। किताब किन्हें पढ़नी चाहिए? अगर आपको बिहार में मौजूद बड़ी रियासतों जैसे दरभंगा या हथुआ राज का सामाज पर प्रभाव, सामाजिक परिवर्तन, जातीय अस्मिता का उभार, किसान आंदोलन, त्रिवेणी संघ की स्थापना, जयप्रकाश नारायण और लोहिया के समाजवाद के परिणामस्वरूप 1990 में लालू प्रसाद यादव के सत्ता में काबिज होने तक के समाजवादी आंदोलन में इंटरेस्ट है तो आपके लिए यह शानदार विकल्प है। इंटरेस्टिंग फैक्ट्स क्या हैं? इस किताब में कई अहम सवालों के जवाब रोचक तरीकों के साथ मिलते हैं। जैसे सामाजिक व्यवस्था में सबसे ऊपर और सबसे नीचे कौन थे, जनेऊ आंदोलन क्या था, त्रिवेणी संघ की स्थापना कैसे हुई, आजादी से पहले ही कांग्रेस के भीतर समाजवादी धारा अलग कैसे उभरी, जेपी और लोहिया ने बिहार की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में कैसे हस्तक्षेप किया, किसान आंदोलन ने कैसे गति पकड़ी, बिहार में वामपंथी आंदोलन का इतिहास क्या रहा और अंततः कैसे कांग्रेस व उसके नेतृत्व में मौजूद ऊंची जातियों का वर्चस्व टूटा और सत्ता पर पिछड़ी जातियों के नेताओं का कब्जा हुआ। #BiharPolitics #bihar
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देख लो भाई इन कॉमेडियनों को... जेएनयू की धरती पर मोदी और शाह की कब्र खोदेंगे। वह भी दिल्ली दंगों के आरोपी और भारत से चिकन नेक असम सहित पूरे पूर्वोत्तर को अलग करने की सोच रखने वाले सरजील इमाम और और उमर खालिद की जमानत अर्जी खारिज होने के बाद... #NarendraModi #AmitShah
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बीते दिसंबर और जनवरी के शुरुआती तीन दिनों में गांधी पर लिखी ये किताब पढ़कर खत्म की। रामचंद्र गुहा की लिखी हुई ‘GANDHI BEFORE INDIA’ का हिंदी अनुवाद दो पार्ट में मौजूद ये किताब गांधी को समझने के लिए ठीक है। हालांकि, बिना एक भी पेज स्किप किए बिना पढने से यह पता चला कि रामचंद्र गुहा का गांधी के लिए सम्मान ज्यादा या थोड़ा झुकाव भी है। साथ ही हिंदू महासभा और सावरकर जैसे दक्षिणपंथी विचारों के प्रति ज्यादा आलोचनात्मक दिखाई देते हैं। हां, रिसर्च बढ़िया है और तथ्य भी करीब-करीब ठीक है। अब सीधे आते हैं गांधी पर। व्यक्तिगत जीवन कैसा रहा? गांधी उस वक्त के मध्यम-वर्गीय परिवार में जन्में एक औसत छात्र रहे थे। गांधी का जन्म राजकोट रियासत के दीवान के घर में हुआ था। गांधी एक धार्मिक व्यक्ति भी थे। गांधी स्वयं को सनातनी हिंदू कहते थे और उनके दैनिक जीवन में रामनाम, गीता-पाठ, उपवास, व्रत और प्रार्थना गहराई से जुड़े थे। पढ़ाई के दौरान भी गांधी एक सामान्य नौजवान की तरह ही थे। वकालत बहुत शानदार नहीं रही। इंग्लैंड से वापस आने के बाद वह वकालत करने मुंबई गए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। विवादों में रहा महिलाओं के साथ संबंध उनका पूरा जीवनकाल भी महिलाओं से संबंधों को लेकर विवादास्पद ही रहा। इनमें साल 1906 में पूर्ण ब्रह्मचर्य का व्रत लेने से लेकर 1919-1920 के दौरान सरला देवी चौधुरानी के साथ उनके प्रेम संबंध और फिर उन्हें अपनी ‘आध्यात्मिक पत्नी’ कहना तक शामिल हैं। इसके बाद जीवन के अंतिम सालों में अपनी पोती मनु के साथ ब्रह्मचर्य की परीक्षा के तौर पर नग्न अवस्था में सोना भी विवादों में रहा। हालांकि, यह डिबेट का विषय है कि ये सही है या नहीं। हालांकि, गांधी ने अपने निजी, सार्वजनिक या राजनीतिक जीवन में अहिंसा को लेकर कभी भी समझौते की कोशिश नहीं कि। राजनीतिक जीवन गांधी के पूरे राजनैतिक जीवन के देखकर लगता है कि वह अपने किसी भी समकालीन नेताओं में सबसे बड़े मास लीडर थे। गांधी की आवाज पर शहरों से लेकर गांवों तक के लोग सड़कों पर उतरते थे। कांग्रेस के साथ अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत के साथ ही गांधी का भरोसा जन-आंदोलनों पर बढ़ता गया। इसकी शुरुआत बिहार में 1917 के चंपारण सत्याग्रह से लेकर 1920 में असहयोग आंदोलन, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक रहा। कांग्रेस पर उनका प्रभाव 1917 के बाद से ही बढ़ता गया और बाद के सालों में वे जीवन पर्यंत इसके निर्विवाद नेता रहे। गांधी ने अपने पूरे राजनैतिक जीवन में नैतिकता का पूरा खयाल रखा। हां, इस वजह से कई बार खुद उन्हें, कई बार कांग्रेस पार्टी को और उनके समर्थकों और स्वतंत्रता आंदोलन पर भी इसका विपरित प्रभाव पड़ा। राजनीतिक भूल खिलाफत आंदोलन का समर्थन, दंगों में हिंदुओं से अधिक नैतिक अपेक्षा, विभाजन के समय मुसलमानों के पक्ष में आग्रह और हिंदू संगठनों की तीखी आलोचनाओं के कारणों से गांधी पर बहुसंख्यक समाज की कीमत पर तुष्टिकरण के आरोप भी लगे जो कुछ हद तक सही भी थे। खिलाफत आंदोलन के दौरान गांधी ने मुस्लिम भावनाओं को साधने के लिए एक इस्लामी मुद्दे को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा जो शायद उनकी ऐतिहासिक भूल रही। आंदोलन के दौरान मुसलमानों की राजनीतिक चेतना और सामूहिक ताकत जागी। इसी दौरान बहुसंख्यक हिंदुओं के मन में इसने कई सवाल खड़े किए। यह एक बड़ी वजह रही जिसने मुसलमानों को अपनी सुरक्षा के लिए अलग रास्ता खोजने के लिए प्रेरित किया जो अंततः पाकिस्तान की मांग में बदल गया। गांधी को कैसे देखें? “पुरखे हमारी साझी विरासत होते हैं” वाली बात गांधी पर पूरी तरह से लागू होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे जिन्होंने अपने नेतृत्व के जरिए देश को स्वतंत्रता की दिशा में प्रेरित किया। हां, “गांधी आलोचनाओं से अछूते नहीं हैं। उनके लिए अंध-भक्ति और अंध-विरोध दोनों ही ठीक नहीं हैं।” ‘X’ पर शब्दों की सीमा है इस वजह से कई जरूरी लिखे हुए को हटाना पड़ा😊 फेसबुक पर पूरा लिखा है👇 facebook.com/share/p/1AWBT5X… #Gandhi #Bharat
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फिर ऐसे लोग तथाकथित बुद्धिजीवी, सेक्युलर और प्रगतिशील लोगों की परिभाषा में फिट नहीं होंगे ना सर। ऐसे लोगों की नसें कई जगह दबी हुई होती हैं। इनकी संवेदनाएं भी चयनात्मक होती हैं। एप्रोच भी सिलेक्टिव होता है।
एक विचार कोई ऐसा कैसे हो सकता है कि हिंदूवाद के पाखंड पर हर दिन गला साफ़ करे लेकिन जब कठमुल्लापन की बात हो तो बिल्कुल मौन साध जाए! ऐसा तो वही कर सकता है जो अपने ‘फ़ैन बेस’ को नाराज़ न करना चाहता हो!
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अरे भाई तुम्हारी बात अब पूरी दुनिया समझ रही है। हिंदुस्तान को समझने में थोड़ी देर लग गई... पर अब पुरानी गलती हिंदुस्तान नहीं दोहराएगा। देश के कई दूरदर्शी नेताओं और बुद्धिजीवियों को आजादी से पहले ही तुम्हारी सोच पता चल चुकी थी। हां, हमने उनकी बात ना मानकर अपना ही नुकसान किया। नतीजा भारत विभाजन सबके सामने है। हां, शायद अब तुम्हारी यह सोच दुनिया के अधिकतर शांतिप्रिय धर्म और मजहब के लोगों को समझ में आ चुकी है।
इस मुल्ले को भी सेकुलरिज़्म से प्रॉब्लम है। दीन को वतन से ऊपर बता रहा है और शरिया को संविधान ये बड़ा! ऐसे मुल्लाओं ने भी मुसलमानों का बेड़ा गर्क ही किया है।
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समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध; जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध। बांग्लादेश में भीड़ के सामने हिंदू दीपू चंद्र दास को जिंदा जला दिया गया। उसका कसूर क्या था? बस इतना कि वह हिंदू था। लेकिन हैरानी देखिए… जब गाजा में हमला होता है, तब भारत के तथाकथित सेक्युलर, स्वयंभू बुद्धिजीवी और अर्बन नैरेटिव गैंग के सोशल मीडिया अकाउंट अचानक एक्टिविस्ट मोड में आ जाते हैं। पोस्ट, स्टोरी, कैंडल मार्च, आँसू और नैतिक उपदेश…सब कुछ रेडी रहता है। मगर जब किसी हिंदू की धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग होती है तब यही लोग चुप्पी साध लेते हैं। जैसे उनके शब्दों पर सेंसर लग गया हो, जैसे इंसाफ का पैमाना अचानक खराब हो गया हो। क्या इंसानी जान की कीमत धर्म देखकर तय होती है? क्या मानवाधिकार सिर्फ चुनिंदा मामलों में ही याद आते हैं? क्या “मोब वायलेंस” सिर्फ तभी मुद्दा बनती है जब नैरेटिव फिट बैठे? हिंदू दीपू चंद्र दास कोई हेडलाइन नहीं बना क्योंकि वह सही “एजेंडा” में फिट नहीं बैठता था। यह चुप्पी मासूम नहीं है। यह चयनात्मक संवेदना है। यह वही नैतिक दिवालियापन है जो एक हत्या पर चीखता है और दूसरी पर नजर फेर लेता है। अगर इंसाफ सच में सेक्युलर है तो उसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी देखकर नहीं बदलना चाहिए। हिंदू दीपू चंद्र दास की हत्या सिर्फ एक अपराध नहीं है। यह उस दोहरे चरित्र पर तमाचा है जो मानवता की बात तो करता है लेकिन इंसान चुनकर। चुप रहना भी एक पक्ष होता है। और आज आपकी चुप्पी बहुत कुछ कह रही है। लिखना नहीं चाह रहा था। लिखने लगा तो और भी कुछ कहने का मन कह रहा था..... आज थोड़ा मन व्यथित और मूड नरम है। कहूंगा भी। #HinduLivesMatter #JusticeForDipuDas #SelectiveSecularism #MobLynching #DoubleStandards
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फिर तो हम सनातनी ही ठीक हैं। खुद कामयाब नहीं होकर भी दूसरों के लिए प्रार्थना करते हैं। साथ में यह विश्वास भी है की पूरी दुनिया के अलग-अलग पंथ को मानने वाले भी कामयाब हो सकते हैं।
"इस्लाम के अलावा दुनिया का हर धर्म, हर विचारधारा, हर नजरिया झूठा है। और कोई भी इंसान तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक वो इस्लाम धर्म नहीं अपना लेता" आपको ये स्कॉलर लगता है-बुद्धिजीवी! कम्युनल है, महिला विरोधी तो अव्वल। पूरी टाइमलाइन भरी है इन्हीं बातों से।
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बहुत धन्यवाद विकास भाई ❤️🙏
हिंदुस्तान के युवा पत्रकार साथी आशुतोष कुमार जी को जन्मदिन की अनंत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ! ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें। @ashutoshkumarbr
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