Writer | Director

Mumbai, India
Joined March 2007
जिन प्रगतिशील रचनाकारों को अब तक इफको साहित्य सम्मान मिला है, इस सम्मान की यह गति देखते हुए उन्हें अब अपना सम्मान वापस कर देना चाहिए।
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भारत सरकार इसराइल के साथ हथियार, तकनीक और मज़दूर भेजने के सौदों को गहरा करती जा रही है, और अक्सर यह मान लिया जाता है कि दिक़्क़त बस एक नेता में है। बुट्टू का तर्क हमें याद दिलाता है कि क़ब्ज़ा किसी एक चेहरे की नीति नहीं, एक व्यवस्था है। जो देश कभी उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ खड़ा था, उसे यह पूछना होगा कि वह इस व्यवस्था के साथ है या उसके शिकार लोगों के साथ। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-26…
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आज बौद्ध धर्म को भीतरी शांति का सबसे बड़ा रास्ता बताया जाता है, और थेरिगाथा को स्त्री-मुक्ति का पुराना दस्तावेज़। देवदत्त पटनायक इस आसान तस्वीर पर सवाल उठाते हैं। वह थेरिगाथा की कवयित्रियों को याद करते हैं: सुमंगलमाता, जो ओखली-मूसल और मारपीट करने वाले पति से छुटकारे का गीत गाती है, और अंबपाली, जो बुढ़ापे में अपने शरीर को घिनौना बताती है। उनका तर्क है कि भिक्षुणी बनने की शर्त थी स्त्री होना ही छोड़ देना, क्योंकि ग्रंथ स्त्री-देह को ही गंदा और भटकाने वाला मानते थे। यह कॉलम इसलिए पढ़ने लायक़ है कि यह मनुस्मृति बनाम थेरिगाथा वाले सस्ते फ़र्क़ को तोड़ता है: दोनों स्त्री से बेचैन हैं, बस एक उसे काबू में रखना चाहता है, दूसरा उसकी इच्छा ही मिटाना। @devduttmyth deshkaal.xyz/vishesh/devdutt…
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अल जज़ीरा का 101 ईस्ट गुप्त कैमरे के साथ कंबोडिया में एक कथित अपराध सरगना के साम्राज्य की पड़ताल करता है, जहां निवेश की चमक के नीचे भ्रष्टाचार और स्कैम कंपाउंड होने के आरोप हैं।
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मुहम्मद मोहसिन इक़बाल लिखते हैं कि जब सरकारें अपने कामकाज का बचाव नहीं कर पातीं, तो बाहरी ख़तरे का शोर सबसे आसान रास्ता बन जाता है।
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नाम कटने का सबूत मतदाता दे या आयोग? पीयूष पांडे का यह लेख आंदोलन के ख़िलाफ़ झुका हुआ है, और इसलिए पढ़ने लायक़ है: इसमें वे सारी दलीलें हैं जो सत्ता के समर्थक दे रहे हैं। पर विपक्ष के कुछ राज्य जीत लेने से यह साबित नहीं होता कि मतदाता सूची साफ़ है। सवाल चुनाव के नतीजे का नहीं, उस मज़दूर, औरत या अल्पसंख्यक का है जिसका नाम चुपचाप कट गया और जिसे पता भी नहीं चला। सबूत का बोझ भी उलटा रखा गया है। जब आयोग ने ख़ुद नागरिकों पर अपनी पात्रता साबित करने का बोझ डाला, तो पारदर्शिता की पहली ज़िम्मेदारी उसी की बनती है। लेखक की सुझायी शर्तें, यानी वजह, सुनवाई और आसान अपील, ठीक वही हैं जिनकी मांग सड़क पर बैठे लोग कर रहे हैं। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-26…
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तानाशाही को सबसे ज़्यादा डर विरोध से नहीं, उस पर हंसे जाने से लगता है, क्योंकि हंसी डर की दीवार में दरार डाल देती है। जब सत्ता तिरंगा लहराने वालों को हिरासत में ले और नौजवान उसका गेम बना दें, तो साफ़ हो जाता है कि नैतिक बढ़त किसके पास है। पर हंसी के पीछे की क़ीमत भी याद रखनी होगी: मुक़दमे, ज़मानत की तारीख़ें और वे ग़रीब और छोटे शहरों के छात्र जिनके पास वकील का ख़र्च नहीं। आंदोलन की ख़ुशमिज़ाजी तभी टिकेगी जब उसके साथ क़ानूनी मदद और एकजुटता का ढांचा भी खड़ा रहे। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-26…
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हबीब सिद्दीक़ी का तर्क है कि जंतर मंतर की बंदी, करोड़ों नामों की कटाई और भारी पुलिस पहरा, तीनों एक ही कहानी के हिस्से हैं: लोकतांत्रिक जगह का सिकुड़ना। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-26…
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जब एक औपनिवेशिक हुकूमत किसानों की गवाही सुनने को तैयार हो गयी थी, तो एक चुनी हुई सरकार अपने ही वोटरों की शिकायत सुनने से क्यों कतराये? यह लेख आंदोलन के पूरे फैलने से पहले लिखा गया था, पर उसकी कसौटी आज भी काम की है: सवाल सिर्फ़ एक अफ़सर का नहीं, उन करोड़ों वोटरों का है जिनके नाम कटने का आरोप है। हल वही होगा जो उन्हें उनका हक़ लौटाये। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-25…
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अगर अपील करने वाले दस में से नौ लोग सही निकले, तो उन लाखों का क्या जिनके पास अपील करने का वक़्त, काग़ज़ या पैसा नहीं था? बहिष्कार की असली मार उन्हीं पर पड़ती है जो सबसे कमज़ोर हैं: प्रवासी मज़दूर, ग़रीब औरतें, अल्पसंख्यक। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-25…
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स्क्रोल से बातचीत में अरुंधति रॉय बताती हैं कि नौजवानों के मीम और मज़ाक़ ने चौबीस साल में गढ़ी गयी एक छवि को दो हफ़्ते में कैसे खोल दिया। यह इंटरव्यू याद दिलाता है कि बेरोज़गारी और पर्चा लीक जैसे सवाल सिर्फ़ प्रशासन की नाकामी नहीं, करोड़ों नौजवानों के भविष्य का मसला हैं। जब संस्थाएं जवाब नहीं देतीं, तो हंसी विरोध की भाषा बन जाती है, और सत्ता अक्सर इसी हंसी से सबसे ज़्यादा घबराती है। असली कसौटी यह होगी कि यह ग़ुस्सा मीम से आगे बढ़कर रोज़गार, परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की ठोस मांगों में बदल पाता है या नहीं। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-24…
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जो आरती हर घर में पूजा के आख़िर में गूंजती है, उसके देवता की न देह है, न कोई कथा। देवदत्त पटनायक बताते हैं कि यह सांचा मिशनरियों की भजन संहिता से आया। deshkaal.xyz/vishesh/devdutt…
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जब संसद का रास्ता बंद हो और अदालत टालती रहे, तो लोकतंत्र की हर सांस सड़क के दबाव पर टिक जाती है। अदालत अगर सचमुच बोले, तो वह किसी की इज़्ज़त बचाने के लिए नहीं, वोटर के हक़ के लिए बोले। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-24…
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देवदत्त पटनायक की व्यंग्य-टिप्पणी: चीनी सैनिकों से डरने के बजाय हम हनुमान चालीसा, मंदिर का प्रसाद और ‘वंदे मातरम’ की तैयारी में हैं, और सीमा पर तैनात सैनिक दिल्ली में छोले-भटूरे खाते हुए बच्चों की वीडियो बनाना सीख रहा है। deshkaal.xyz/hamsafar/2026-1…
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वाह मार्को रूबियो साहब, क्या बढ़िया диплоमेसी है! भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिका का सर्टिफिकेट मुफ़्त में बंट रहा है, बस ट्रेड डील की रफ़्तार कम नहीं होनी चाहिए। abplive.com/news/india/us-ma…
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राजेंद्र धोड़पकर की रेखाएं उस तमाशबीन समाज को पकड़ती हैं जो हमले से ज़्यादा हमले की चीख़ से असहज होता है। संस्कार का पैमाना यहां उलटा चल रहा है: जो चुप रहे वह संस्कारी, और जो बोल पड़े वह बेशर्म। @Rajendradhodap2 deshkaal.xyz/cartoon/2026-10…
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न्यूज़ ब्रॉडकास्टर @DeutscheWelle की यह फ़िल्म बांग्लादेश, कोलंबिया और प्रशांत द्वीपों के ज़रिये दिखाती है कि मौसम की मार से उजड़े लोग क़ानून की नज़र में शरणार्थी तक नहीं हैं। भारत इस बहस से अलग नहीं है। सुंदरबन के डूबते द्वीप, ओडिशा के तट पर समंदर में समाते गांव और हिमालय में धंसती बस्तियां बताती हैं कि जलवायु विस्थापन यहां भी शुरू हो चुका है, पर हमारे पास न इसकी गिनती है, न पुनर्वास की कोई नीति। उजड़ने वालों में ज़्यादातर मछुआरे, भूमिहीन दलित, आदिवासी और छोटे किसान हैं, जिनकी आवाज़ पहले से कमज़ोर है। बांग्लादेश से आने वाले जलवायु प्रवासियों को 'घुसपैठिया' कहने की राजनीति इस सच्चाई को और धुंधला करती है। जो लोग समंदर से हारकर सरहद पार करते हैं, उन्हें अपराधी नहीं, एक साझा संकट के शिकार के तौर पर देखना होगा। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-23…
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पाकिस्तान तो पाकिस्तान, इधर भी मामला कुछ अलग नहीं है। हमारे यहां भी रटंत पढ़ाई, ऊंच-नीच वाली कक्षाएं और सवाल पूछने वाले छात्र को राष्ट्र-विरोधी कहने का चलन बढ़ा है। सबसे ज़्यादा क़ीमत वे चुकाते हैं जिनके सवाल जाति, धर्म या लिंग की बनी-बनायी व्यवस्था को छूते हैं: दलित और आदिवासी छात्र, घरों में चुप रहने को कही गयी औरतें। सत्ता को फ़रमाबरदार नागरिक सुविधाजनक लगते हैं, पर कोई भी लोकतंत्र सवालों के बिना ज़िंदा नहीं रहता। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-23…
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यूरोप की यह बग़ावत याद दिलाती है कि जब सरकारें स्कूल और अस्पताल की क़ीमत पर हथियार ख़रीदती हैं, तो सबसे पहले नौजवानों का सब्र टूटता है। भारत में भी सरकारी स्कूलों के विलय और बंदी, कच्ची नौकरियां और बढ़ते किराये उन्हीं परिवारों पर भारी हैं जो दलित, आदिवासी, मुसलमान और मज़दूर तबक़ों से आते हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि यहां ऐसे ग़ुस्से को अक्सर देशद्रोह या दंगा कहकर ख़ारिज कर दिया जाता है। फ़्रांस में नाबालिगों पर पुलिस की ज़्यादती को दुनिया देख रही है; हमें अपने यहां के कैंपसों और बस्तियों की ख़ामोशी भी सुननी चाहिए। deshkaal.xyz/lekh/2026-10-23…
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