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#मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 से क्यों डरती है
देश की सरकार ?
#1861__अंग्रेज़ी_पोलिस_क़ानून देश के लिए
एक अभिशाप ?
नही इच्छाशक्ति ,न कोई सरोकार बस जुमलेबाज
सरकार और कमजोर समाज 😡
#मॉडल_पोलिस_ऐक्ट_2006 लागू
करें .@PMOIndia @HMOIndia @narendramodi @AmitShah
और एक लखनऊ अवध बार है वो बहिष्कार की जगह चुनाव करवा रही है ?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंदर वकीलों ने किया हंगामा
कोर्ट रूम और परिसर में वकीलों ने तोड़फोड़ भी किया
जस्टिस अजय भनोट ने कोर्ट रूम से वकील से माफी मंगवाई जिसको लेकर वकीलों में है आक्रोश
आक्रोशित वकीलों ने हाईकोर्ट में कार्य बहिष्कार किया
हाईकोर्ट बार एसोसिएशन भी वकीलों के समर्थन में उनके साथ खड़ा है
जस्टिस द्वारा वकीलों का अपमान करने का है आरोप
लूटो साधो ये भ्रष्टाचार का देश !
भास्कर की रिपोर्ट है, जरा देखिए:
राजस्थान कैडर के सीनियर आईएएस शिखर अग्रवाल, उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर, दोनों बेटे और सास-ससुर ने ढाई साल के भीतर एक ही कंपनी से 40 विला-कॉटेज खरीदे हैं. भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि अलवर के अजबगढ़ में 20 विला की मार्च 2026 और उदयपुर के बुढ़ड़ा में 20 कॉटेज की रजिस्ट्री सितंबर 2023 में हुई. इन्हें बेचने वाली कंपनी का नाम गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड है. इसके देशभर में अनंता नाम से 14 रिसॉर्ट व होटल हैं. आईएएस-आईपीएस दंपती के परिवार ने कंपनी से बुढ़ड़ा और अजबगढ़ के अनंता रिसॉर्ट में ही विला-कॉटेज खरीदे. इनकी रजिस्ट्रियों के दस्तावेज भास्कर के पास मौजूद हैं.
शिखर वर्तमान में राजस्थान सरकार में एसीएस हैं. उनके पास उद्योग, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग, सरकारी उपक्रम, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर और निवेश एवं प्रवासी राजस्थानियों मामलों के विभाग हैं. वे रीको अध्यक्ष और राजसिको के अध्यक्ष भी हैं. उनकी आईपीएस पत्नी प्रशाखा माथुर प्रदेश की एडीजी हैं. वे फिलहाल योजना, आधुनिकीकरण व कल्याण का काम देख रही हैं.
कागजों पर हिट गए लेकिन जनता की नजर में हार गए हैं !
नैतिक पतन कागजी पतन से अधिक प्रभावी होता है !
बड़ी खबर-
योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा वाली गोरखपुर-फ़ैज़ाबाद MLC सीट पर यूँ हुई धांधली?
“42 हजार वोटों की गिनती तक हम आगे थे,
आखिरी के 1600 वोटों में खेल करके बीजेपी प्रत्याशी को जिता दिया गया।
हमारे प्रत्याशी के प्रथम वरीयता के वोटो में 1 की जगह 4 लिखकर बीजेपी उम्मीदवार को जिता दिया गया।”
योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा की सीट बन चुकी गोरखपुर फैजाबाद एमएलसी सीट पर किस तरह से बीजेपी के उम्मीदवार को आखिरी मौके पर जिताया गया है,
इसकी बानगी सुनिए।
3 राउंड की गिनती के बाद 376 वोटों से आगे चल रहे निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव को एकाएक पीछे करवा दिया गया।
आरोप है कि प्रशासन ने जमकर के पक्षपात किया।
ऐसा लग रहा था जैसे पहले से इंस्ट्रक्शंस मिला हो कि करना क्या है?
आरोप है कि काँटे के मुक़ाबले में फँसी सीट को बेईमानी की इंतिहा पार करके योगी आदित्यनाथ की ‘कथित’ प्रतिष्ठा बचाई गई।
कुंदरकी जैसी जीत हासिल कर लोकतंत्र को हाइजैक करने की कीमत चुकाई गई?
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू ने चंद्रचूड़ पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाया। उनका यह बयान पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की आने वाली किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ में किए गए खुलासों के बीच सामने आया है।
मार्कंडेय काटजू ने सोशल मीडिया पर लिखा कि डीवाई चंद्रचूड़ अपने करियर को आगे बढ़ाने में लगे रहते थे और भारत का मुख्य न्यायाधीश बनने के लिए समझौते करने को तैयार थे। उन्होंने आरोप लगाया कि चंद्रचूड़ ने मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद भी न्यायपालिका को शर्मिंदा किया। काटजू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने आवास पर गणेश पूजा के लिए आमंत्रित करने का भी जिक्र किया।
वहीं, डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल को लेकर कानूनी विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने उनके कार्यकाल को न्यायपालिका का स्वर्णिम दौर बताया है। उन्होंने इस आरोप को भी खारिज किया कि चंद्रचूड़ सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरम थे। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विकास सिंह ने संजय किशन कौल के विचारों का समर्थन किया है।
पूरा विवाद पूर्व न्यायाधीश संजय किशन कौल की किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ में किए गए दावों से जुड़ा है। किताब में कॉलेजियम की बैठकों और न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर हुई चर्चाओं का जिक्र किया गया है। कौल ने आरोप लगाया है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा विनम्र रवैया अपना रहे थे।
जस्टिस कौल के मुताबिक, कॉलेजियम में पांच नामों पर सहमति बन चुकी थी, लेकिन बैठक से ठीक पहले चंद्रचूड़ ने छठे उम्मीदवार का नाम सामने रखा। उन्होंने इस नाम पर सरकार की राय जानने का विचार भी जाहिर किया था।
कौल ने किताब में लिखा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश उन्हें एक अलग कमरे में ले गए और पूछा कि क्या इस नाम पर सरकार की राय लेने के लिए फोन करना चाहिए। हालांकि, कौल ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें नहीं लगता कि यह सरकार को खुश करने का मामला था।
जस्टिस कौल के अनुसार, पांच नामों पर पहले ही सहमति बन गई थी। जब छठा नाम सामने आया, तो उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि अगर वह इस नाम पर सहमत भी हो जाते, तब भी कॉलेजियम के दूसरे सदस्य इसे मंजूरी नहीं देते। बाद में बैठक में भी यही स्थिति सामने आई।
कौल ने अपनी किताब में यह भी लिखा है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तालमेल बनाए रखने के तरीके को लेकर उनके और डीवाई चंद्रचूड़ के बीच मतभेद पैदा हो गए थे। जून 2022 से वह चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम का हिस्सा थे।
इन आरोपों पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर चर्चा के दौरान कॉलेजियम के सदस्यों के बीच किसी भी नाम को लेकर असंतोष नहीं था। इस बयान के बाद कॉलेजियम की कार्यप्रणाली और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज हो गई है।
#DYChandrachud #MarkandeyKatju #SanjayKishanKaul #SupremeCourt #IndianJudiciary #CollegiumSystem #JudicialAppointments #Justice #IndiaNews
फोटो मोदी जी के साथ और mlc election में पूरा जोर केवल गोरखपुर🤣
इसकी समीक्षा करते हैं -
यह एक लाख नियुक्तियों का लक्ष्य है।
इसे एक लाख लोगों को नियुक्ति-पत्र मिल जाने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
सरकार ने छह महीने में एक लाख नौकरियाँ देने की बात कही थी !
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार परीक्षा हो चुकी थी, लेकिन शारीरिक और मेडिकल प्रक्रिया चल रही थी।
इसलिए पूरे 36,000 से अधिक अभ्यर्थियों को नियुक्त मानना उचित नहीं है।
यह अपेक्षित नियुक्तियों का आँकड़ा है।
इसे वास्तविक नियुक्तियों की संख्या साबित
करने के लिए पदवार अंतिम चयन सूची और नियुक्ति-पत्रों का विवरण चाहिए।
आयोग की परीक्षाओं और विभिन्न विभागों की भर्तियों को अलग-अलग देखना होगा।
इस संख्या के सभी पदों पर नियुक्ति हो जाने का प्रमाण केवल इस कटिंग से नहीं मिलता !
41,424 अभ्यर्थियों की अंतिम चयन सूची जारी होने की रिपोर्ट उपलब्ध है।
हालाँकि चयन के बाद मेडिकल और पुलिस सत्यापन जैसी प्रक्रियाएँ बाकी हो सकती हैं !
15 सितंबर 2026 को 12,405 सहायक अध्यापक पदों और 2,607 PGT पदों के लिए भर्ती विज्ञापन जारी होने की रिपोर्ट है
कुल 15,012 पद।
यह भर्ती प्रक्रिया का प्रमाण है,सभी पदों पर नियुक्ति हो जाने का नहीं।
अतिरिक्त पदों के लिए अलग प्रमाण चाहिए।
विदेश में रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं, लेकिन अवसरों की उपलब्धता और उत्तर प्रदेश के बेरोजगार युवाओं को वास्तव में मिली नौकरियाँ अलग-अलग बातें हैं।
जर्मनी, जापान आदि के लिए देशवार नियुक्ति आँकड़े चाहिए।
इजरायल में काम करने वाले उत्तर प्रदेश के श्रमिकों के बारे में सरकारी जानकारी उपलब्ध है। केंद्र सरकार के अनुसार जुलाई 2025 तक द्विपक्षीय व्यवस्था के तहत 6,774 भारतीय श्रमिक इजरायल पहुँच चुके थे !
उत्तर प्रदेश सरकार ने मार्च 2026 में वहाँ 6,004 निर्माण श्रमिकों के काम करने की जानकारी दी थी !
उत्तर प्रदेश आउटसोर्सिंग सर्विसेज कॉरपोरेशन शुरू किए जाने की रिपोर्ट है।
इसमें वेतन, PF और ESI व्यवस्था बेहतर करने का उद्देश्य बताया गया है।
लेकिन कितने कर्मियों को वास्तव में लाभ मिला, यह अलग से सत्यापित करना होगा।
10. 1.18 करोड़ लोगों को ₹1,500 मासिक पेंशन -
पेंशन राशि ₹1,500 करने की घोषणा की रिपोर्ट उपलब्ध है।
लेकिन कितने लाभार्थियों के खातों में नई दर से भुगतान शुरू हुआ, इसकी पुष्टि के लिए सरकारी आदेश और भुगतान आँकड़े चाहिए।
मिड-डे मील रसोइयों का मानदेय ₹2,000 से ₹3,000 वृद्धि की घोषणा की पुष्टि है -
भुगतान की वास्तविक स्थिति अलग जाँच का विषय है।
मिड डे मिल की ध्वस्त स्थिति वैसे ही प्रचलित है !
पेंशन ₹1,000 से ₹1,500 लागू भ्रामक दावा-
22 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार वृद्धि प्रस्तावित थी, लेकिन मंजूरी और लागू होने की पुष्टि नहीं थी।
आउटसोर्सिंग कर्मियों को सामाजिक सुरक्षा निगम शुरू हुआ है, लेकिन सभी 3.5 लाख कर्मियों को सभी लाभ मिल चुके हैं, यह अलग से साबित करना होगा।
आंगनबाड़ी मानदेय ₹8,000 से ₹12,000 सरकारी आदेश के अनुसार वृद्धि सितंबर 2026 से प्रभावी और भुगतान अक्टूबर में निर्धारित था। इसे झूठा कहना उचित नहीं होगा।
नौ वर्षों में 2.25 लाख पुलिस भर्तियाँ सरकारी भर्ती आँकड़ों में लगभग 2.14–2.18 लाख भर्तियों की रिपोर्ट पहले से उपलब्ध है।
इसलिए इस दावे को सीधे फर्जी नहीं कहा जा सकता लेकिन प्रामाणिक करना मूल दायित्व है पहले अखबार का -
योगी सरकार बताए-
कितनी घोषणाएँ लागू हुईं, कितने लोगों को वास्तविक लाभ मिला और कितने लोग आज भी मानदेय, पेंशन तथा सामाजिक सुरक्षा के इंतजार में हैं ?
विज्ञापन नहीं, विभागवार आँकड़े और भुगतान का प्रमाण सार्वजनिक किया जाए।
सटीक अवधि और संख्या की पुष्टि जरूरी है।
महाराष्ट्र नवभारत टाइम्स में ये विज्ञापन जनता
के टैक्स के पैसे से दिया गया या बीजेपी के राजनीतिक दल के चंदे के पैसे से ?
@NavbharatTimes @Nvbhrt_Times_Ad
@samajwadiparty
जब तक देश में "इंटर कैनाल योजना" नहीं लागू होगी सूखे की आड में केवल बजट ही पास होगा !
देश की नदियों को सूखे इलाके से जोड़ना ही समाधान है !

















