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अदब्धानि वरुणस्य व्रतानि Politics | Culture | Astrology (प्रान्त संयोजक, अखिल भारतीय विद्वत्परिषद्)

Jaipur
Joined June 2015
एक बार किसी ने योगीराज देवरहा बाबा जी से पूछा मन्दिर कौन बनवाएगा, देवरहा बाबा ने अशोक सिंघल जी को दिखा कर कहा, यही बनवाएंगे। हिन्दू हृदय सम्राट श्री अशोक सिंघल जी की जन्म शताब्दी पर शत-शत नमन @MuditUpdates
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परम आदरणीय श्री आडवाणी जी का पूरे साल जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जाने चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी के लिए यह दीपावली विशेष है। बीजेपी के वरिष्ठतम नेता और भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी रविवार को जीवन के सौंवे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। बीजेपी मुख्यालय पर इस अवसर पर यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। उनके जीवन पर आधारित एक फिल्म भी दिखाई जाएगी। पीएम मोदी उनसे भेंट कर आशीर्वाद लेंगे।
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रावण के प्रति नख भर सम्मान वैदिक संस्कृति के प्रति द्रोह है। रावण प्रतीक है व्यभिचार का जिसने अपनी पुत्रवधू तक पर कुदृष्टि डाली, अपनी पत्नी मंदोदरी की बहन के माया के साथ कुकर्म किया और उसके पति को मारकर उसे उठा लाया। रावण प्रतीक है अपने सगे संबंधियों को त्रास देने का, उसने अपनी बहन सूर्पनखा के पति विद्युत जिह्वा की हत्या कर दी। उसने अपने भाई से लंका छीन ली, अपने पिता को त्रास दिया, अपने मामा को स्वार्थ में मरवा दिया। अपने कुल खानदान को अपनी महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ा दिया। अपने भाई को लात मार भगा दिया। रावण प्रतीक है अघन्या गाय के हत्यारे का, ऋषियों ब्राह्मणों के सामूहिक नरसंहार का। वैदिक व्यवस्था का परम शत्रु था रावण। यज्ञ और धर्म के किसी भी स्वरूप को अमान्य घोषित करने वाला रावण वैदिक देवताओं के प्रति घोर असभ्य था। रावण प्रतीक है कृतघ्नता का, उसने भगवान शिव से कृतघ्नता की, वह उतना ही शिवभक्त था जितना भस्मासुर, वस्तुतः उसने शिव के सामने दीन हीन होने का ढोंग किया। वह भगवान शिव से भी अहंकार करता था। ब्रह्मा से वर प्राप्त करने के बाद उनके प्रति भी वह कृतघ्न हो गया। अपने मित्रों से भी उसने कृतघ्नता की। रावण प्रतीक है शक्ति और ज्ञान के दुरुपयोग का, कुसंस्कारित कुपात्र को विद्या मिलने पर वह क्या करता है इसका जीता जागता उदाहरण रावण है। रावण प्रतीक है क्षुद्र बुद्धि और मलिन मानस का, नारी जाति के प्रति घृणा का, सुर धेनु विप्र और मनुष्य के प्रति घृणा रखने वाला रावण प्रतीक है दम्भ, असभ्यता और विध्वंस का। कुछ घृणित लोग रावण को महान बता रहे यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कुछ नीच लोग महिषासुर को महान बताते हैं। पहले समाज के रावणों और महिषासुरों का सजीव दहन मर्दन होता था पर बलिहारी इस लोकतंत्र की कि हर टुच्चा आदमी अपनी दो कौड़ी की जबान हिला कर कुछ भी बोल सकता है। पहचानिए ऐसे दुष्टात्माओं को और दहन करिये उनका। और हां ये ब्रह्महत्या वाला पाप फर्जी नरेटिव है, ब्रह्मा जिसके वध की इच्छा स्वयं रखते हों ऐसे गोघाती, सुर त्रासी ब्राह्मण द्रोही रावण के वध पर ब्रह्म हत्या लगने की बात कोई घृणित व्यक्ति ही कह सकता है। जय जय श्रीराम
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आपके समस्त पटाखे अपने पितरों को समर्पित हैं, पटाखे चलाते हुए पितरों का स्मरण भी करें। अनार, फुलझड़ी, रॉकेट, शॉट्स चलाना बहुत शुभ है।
दीपावली पर पटाखे जलाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। उल्कादान से ही यह अत्यंत विकसित अवस्था में पहुंच गया है। आश्विन कृष्णपक्ष से ही यमलोक से पितृ छूटकर वंशजों के द्वार पर 15 दिन श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं, महालय अमावस्या तक। तब भी श्राद्ध नहीं मिलता तो एक महीना और कार्त्तिक अमावस्या तक प्रतीक्षा करते हैं। अतः दीपावली को श्राद्ध अवश्य किया जाता है। इस दिन सब पितृ पुनः पितृलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। तब उन्हें मार्ग दिखाने के लिए हाथों में फुलझड़ी और ऐसे पटाखे जिनसे प्रकाश ऊपर की ओर जाता हो, उन्हें दिखाकर उनका मार्गदर्शन कर पितरों को विदा किया जाता है। यह उल्कादान सब शास्त्रों में वर्णित है। आकाश में जिसे तारे टूटना कहते हैं उसे उल्का कहते हैं, यह आतिशबाजी ही उल्का दान कहलाती है जो दीपावली पर कृत्य कर्म है। यह उल्कादान ही भव्य आतिशबाजी के रूप में विकसित हुआ है। प्राचीनकाल से ही हम दीपावली पर पटाखे चलाते आए हैं। इस बार दो फुलझड़ी आकाश की ओर दिखाकर अपने पितरों का स्मरण करें और उल्कादान करें। तुलासंस्थे सहस्रांशो प्रदोषे भूतदर्शयोः। उल्काहस्ता नराः कुर्युः पितृणां मार्गदर्शनम्॥ ― @MuditUpdates
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कल मैंने भी यह लिखा था कि आतिशबाजी पूर्णतः शास्त्रसम्मत है, व पितरों के लिए उल्कादान का ही विकसित रूप है। तो कल कुछ लोग मुझे पापी कह रहे थे। जबकि देशभर के हर क्षेत्र में उल्कादान ही आतिशबाजी का जनक रहा है, सभी विद्वानों का यही मत है। केवल उल्कादान ही नहीं दीपावली पर आतिशबाजी श्रुति प्रमाण से भी सिद्ध हो जाती है।
It's your duty to burst crackers on Dīpāvali. A duty towards your ancestors. Tonight and tomorrow, when we light a sparkler and lift it toward the sky, we should ask whether we still know what that gesture is. The śāstra gives a clear answer. On these nights the pitṛs, our ancestors, are returning to Pitṛloka, and we are told to light their way. उल्काहस्ता नराः कुर्युः पितॄणां मार्गदर्शनम्। (स्कन्दपुराण) Let people, torches in hand, show the ancestors their path. अत्र प्रातः अभ्यंगं देवपूजादिकं कृत्वा, अपराह्णे पार्वणश्राद्धं कृत्वा, प्रदोषसमये दीपदानं उल्काप्रदर्शनं लक्ष्मीपूजनं च कृत्वा, भोजनं कार्यम्। (धर्मसिन्धु) On the morning of Dīpāvali, an oil bath (abhyaṅga) and worship of the deities. In the afternoon, the Pārvaṇa Śrāddha. At Pradoṣa, the offering of lamps, the raising of flame to the sky (ulkā-pradarśana), and Lakṣmī pūjā. Only then the meal. The ulkā was once a simple thing: a stick wrapped in oil-soaked cloth, lit and held up high. Over the centuries, the torch became the sparkler, the rocket and the cracker. The form has changed; the intention has not. The light still goes upward on the same night. Andhra and many other parts of the country still keep the older form. After Lakṣmī pūjā, children go into the courtyard holding a gongura or castor stalk with burning bundles of oil-soaked cloth tied to it. When the flame has burnt down, they strike the stalk on the ground and call out, "Dibbu dibbu Dīpāvali, malli vacce Nāgula Cavithi." Most of them do not know that they are doing Ulkā Darśana. They are simply doing what their grandparents did, and so the rite survives in them. So tonight, when you take the children out, tell them before the first sparkler is lit: this flame is for your great-grandparents, and for theirs. Hold it high, think of them for a moment, and then let it burn. One day someone will hold up a light for you too. Nilmadhab Prasad Sahi (Vedanjanam) Jai Dvārikādhīśa
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भारत में अगर कोई शहर दीपावली के समय सबसे खूबसूरत लगता है तो वह है पिंक सिटी मतलब की जयपुर एक बार अगर दीपावली के समय जिसने जयपुर घूम लिया, वह हर साल जयपुर घूमने आता है दीपावली पर इसकी खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है ऐसे ही विदेशी लोग जयपुर की तरफ नहीं भागते कुछ तो खास है Happy Diwali to all my friends from Jaipur. Happy Diwali.🛸🎆🎇🪔🪅🎋🪔🧨
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दुनिया की सबसे सजावट वाली कोई दीवाली है तो वो पिंक सिटी जयपुर की है क्योंकि इसमें इतनी रोशनी के अलवा साथ साथ मे यहां के लोगो....Read More
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View of Jaipur every Diwali
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The pink city, Jaipur, during Diwali 🎇🪔
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Guess the शहर? 🩷
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पाकिस्तान का बजट एक तरफ, जयपुर वालों की आज की कार खरीदारी एक तरफ 😂😎🔥 #jaipur #diwali
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कितना खुबसूरत लग रहा है दीपावली पर जयपुर 🔥 #छोटी_दीपावली
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अग्निदेव का वाहन बकरा (मेष) है।
في مشهد غريب تيس يقرب راسه من النار لدرجة تأثره بقوه منها : من الذكي الي يفسر لنا سبب فعله هذا ؟!!
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जैपर शहर की रौशनी #jaipur #Diwali2026
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जयपुर हमे ऐसे ही पसंद नहीं है ❤️ जयपुर की तो बात ही अलग है ।
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🌹 *दीपावली लक्ष्मीपूजन के मुहूर्त्त* 🌹 *दीपावली 8 नवंबर 2026, रविवार को है।* दीपावली में लक्ष्मी पूजा के 3 काल सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं – प्रदोषकाल, वृष लग्न और सिंह लग्न। सूर्यास्त के 72 मिनट बाद तक प्रदोषकाल होता है, और इसके ठीक बाद वृष लग्न होता है और ढलती रात में सिंह लग्न आता है। प्रदोषकाल और वृष लग्न में पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त होता है। *8 नवंबर को दीपावली के सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त* 🌺 *राजमुहूर्त्त* 🌺 *शाम 06:06 से 07:58 तक* (इस समय प्रदोषकाल और वृष लग्न दोनों रहेंगे, अतः यह सबसे सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त्त होगा) *शाम 06:17 से 06:28 तक* (इस समय स्थिर वृष लग्न में स्थिर सिंह नवांश रहेगा) *शाम 06:53 से 07:05 तक* (इस समय स्थिर वृष लग्न में स्थिर वृष नवांश रहेगा) ◆ *प्रदोष काल मुहूर्त्त–* शाम 05:34 से 07:58 तक ◆ *शाम के समय स्थिर लग्न वृष –* शाम 06:06 से 08:02 तक *मध्यरात्रि के समय स्थिर लग्न सिंह* *अर्धरात्रि 00:36 से 02:53 तक* *निशीथ मुहूर्त्त* रात 11:42 से 00:35 तक पूरी जानकारी यहाँ पर reportbharathindi.com/diwali… 🌷 *श्रीसर्वेश्वर जयादित्य पञ्चाङ्ग* 🌷 (जयपुर के सूर्योदय सूर्यास्त के आधार पर) ― मुदित मित्तल सम्पादक @MuditUpdates
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दीपावली के आगमन पर… जोधपुर… राजस्थान के शहर दीपावली पर हमेशा से सजते आए हैं जयपुर सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरती से सजता है… फिर जोधपुर, बीकानेर, कोटा… और किसी राज्य में इस तरह शायद ही सजाते हो शहरों को,..
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दीपावली पर पटाखे जलाना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है। उल्कादान से ही यह अत्यंत विकसित अवस्था में पहुंच गया है। आश्विन कृष्णपक्ष से ही यमलोक से पितृ छूटकर वंशजों के द्वार पर 15 दिन श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं, महालय अमावस्या तक। तब भी श्राद्ध नहीं मिलता तो एक महीना और कार्त्तिक अमावस्या तक प्रतीक्षा करते हैं। अतः दीपावली को श्राद्ध अवश्य किया जाता है। इस दिन सब पितृ पुनः पितृलोक की ओर प्रस्थान करते हैं। तब उन्हें मार्ग दिखाने के लिए हाथों में फुलझड़ी और ऐसे पटाखे जिनसे प्रकाश ऊपर की ओर जाता हो, उन्हें दिखाकर उनका मार्गदर्शन कर पितरों को विदा किया जाता है। यह उल्कादान सब शास्त्रों में वर्णित है। आकाश में जिसे तारे टूटना कहते हैं उसे उल्का कहते हैं, यह आतिशबाजी ही उल्का दान कहलाती है जो दीपावली पर कृत्य कर्म है। यह उल्कादान ही भव्य आतिशबाजी के रूप में विकसित हुआ है। प्राचीनकाल से ही हम दीपावली पर पटाखे चलाते आए हैं। इस बार दो फुलझड़ी आकाश की ओर दिखाकर अपने पितरों का स्मरण करें और उल्कादान करें। तुलासंस्थे सहस्रांशो प्रदोषे भूतदर्शयोः। उल्काहस्ता नराः कुर्युः पितृणां मार्गदर्शनम्॥ ― @MuditUpdates
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This 6kka generation does not burst firecrackers. Gen Z and Gen Alpha. A lot of my favourite childhood memories as a little boy was walking around like a commando with a bag full of explosives especially blowing up that green bomb. Diwali should sound like AKs going off for 5 days. It did until a decade ago.
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संसार में दीपावली से बड़ा पर्व नहीं है, इसमें छोटे छोटे इतने महत्त्वपूर्ण कृत्य हैं कि उन्हें करने पर मनुष्य का सब प्रकार से मङ्गल होता है। ये कृत्य वैदिक ऋषियों की कुटियाओं से सीधे लाखों करोड़ों वर्षों बाद भी चले आ रहे हैं, चाहे धन्वंतरि पूजन हो, स्वर्ण रजत का क्रय विक्रय हो, स्वच्छता व सुंदरता का चहुंओर अभियान हो, यम को दीपदान हो, नरक को दीपदान हो, सिर पर अपामार्ग का भ्रम हो, अभ्यंग स्नान हो, सायं पितरों के मार्गदर्शन को उल्कादान हो, अमावस्या को दर्श श्राद्ध हो, माता महालक्ष्मी की पूजा हो, साथ में श्रीगणेश विराजे हों, तड़के पूर्व ही दरिद्रता निवारण हो, गोवर्धन पूजन हो, अन्नकूट महोत्सव हो, यमद्वितीया भाईदूज हो। समस्त तंत्रों का मिला जुला निचोड़ दीपावली में ही है। समस्त साल भर का सार दीपावली में ही है। दीपावली समस्त मंगलों का मूल है। यह समस्त स्वस्ति का सूत्र है। समस्त शुभों की शोभा है। समस्त लाभों का लय है। दीपावली दीपों की पंक्ति है जो पितरों को पितृलोक पहुंचाती है, भक्तों के समस्त लोक प्रशस्त करती है और मुनियों को ब्रह्मलोक की ओर ले जाती है। दीपावली के रहस्य अगाध अनन्त अज्ञेय व अपरिमित हैं। धर्मशास्त्र के अनुसार उन कृत्यों को अवश्य करना चाहिए। जो सक्षम हैं उन्हें दिन रात जागकर श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त आदि जप करना चाहिए। जो ऐसा करता है वह भगवती का प्रिय पुत्र होता है। जय माँ लक्ष्मी @MuditUpdates
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◆ नरक चतुर्दशी का कृत्य नरक चतुर्दशी को नरक निमित्त चतुर्मुख दीपदान चार मुँह का दीपक नरक के उद्देश्य से दान करे। पूर्वाभिमुख होकर दीप की पूजा कर दीपदान करे। दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया। चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये॥ ध्यान दें यम निमित्त दीपदान धनत्रयोदशी को प्रदोष काल में हो चुका है, वह एक बत्ती वाला है। नरक निमित्त दीपदान चार बत्ती वाला है, वह नरक चतुर्दशी को होगा। परन्तु यम तर्पण इसी दिन होगा और प्रातः पूर्वाह्न में ही होगा, प्रदोष में नरक दीपदान होगा। अब आगे नरक चतुर्दशी का कृत्य देखें, ◆ लिङ्गपुराण में माषपत्र शाक का विधान माषपत्रस्य शाकेन भुक्त्वा तत्र दिने नरः। प्रेताख्यायां चतुर्दश्यां सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ प्रेत चतुर्दशी अर्थात् नरक चतुर्दशी के दिन जो मनुष्य उड़द के पत्तों से बने शाक का भोजन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यह लिङ्गपुराण में वर्णित है। ◆ नरक चतुर्दशी को यमतर्पण की अनिवार्यता दीपोत्सवचतुर्दश्यां कार्यं तु यमतर्पणम्॥ दीपोत्सव की चतुर्दशी के दिन यमराज के निमित्त तर्पण अवश्य करना चाहिए। ◆ अपामार्ग द्वारा शिरोभ्रमण और यमतर्पण अपामार्गस्य पत्राणि भ्रामयेच्छिरसोपरि। ततश्च तर्पणं कार्यं धर्मराजस्य नामभिः॥ नरक चतुर्दशी के दिन अपामार्ग अर्थात् चिरचिटा के पत्तों को अपने सिर के ऊपर घुमाना चाहिए। इसके पश्चात् धर्मराज यम के विभिन्न नामों का उच्चारण करते हुए उनका तर्पण करना चाहिए। ◆ यमराज के चौदह नाम यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च। वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च॥ औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने। वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः॥ यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त, इन चौदह नामों वाले यमराज को नमस्कार है। ◆ हेमाद्रि में तर्पण की विधि और फल एकैकेन तिलमिश्रान् दद्याच्च त्रीन् जलाञ्जलीन्। संवत्सरकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ यमराज के प्रत्येक नाम का उच्चारण करते हुए तिलमिश्रित जल की तीन तीन अञ्जलियाँ अर्पित करे। ऐसा करने से वर्षभर में किए हुए पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं। दक्षिणाभिमुखो भूत्वा तिलैः सव्यं समाहितः। देवतीर्थेन देवत्वात्तिलैः प्रेताधिपो यतः॥ दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, सव्य अवस्था में तिलयुक्त जल से यमराज का देवतीर्थ से तर्पण करे। यज्ञोपवीतिना कार्यं प्राचीनावीतिना तथा॥ यमतर्पण यज्ञोपवीती अथवा प्राचीनावीती दोनों अवस्था में किया जाता है। यहां देवकार्य होने से ऐसे एक एक नाम बोलकर के सव्य होकर देवतीर्थ से करे। ॐ यमाय नमः ॥३॥ ॐ धर्मराजाय नमः ॥३॥ ॐ मृत्यवे नमः ॥३॥ ॐ अन्तकाय नमः ॥३॥ ॐ वैवस्वताय नमः ॥३॥ ॐ कालाय नमः ॥३॥ ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः ॥३॥ ॐ औदुम्बराय नमः ॥३॥ ॐ दध्नाय नमः ॥३॥ ॐ नीलाय नमः ॥३॥ ॐ परमेष्ठिने नमः ॥३॥ ॐ वृकोदराय नमः ॥३॥ ॐ चित्राय नमः ॥३॥ ॐ चित्रगुप्ताय नमः ॥३॥ ◆ जीवित पिता वाले भी नरक चतुर्दशी को करें यमतर्पण जीवत्पितापि कुर्वीत तर्पणं यमभीष्मयोः॥ जिस व्यक्ति के पिता जीवित हैं, उसे भी यमराज तथा भीष्म पितामह का तर्पण करना चाहिए। कार्त्तिक अमावस्या दीपावली को अब अभ्यंग होगा, प्रातःकाल अपामार्ग का शिरोभ्रमण तो उस दिन भी होगा। ----- @MuditUpdates
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